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 मध्यकालीन हिन्दी साहित्य :  : अवधारणा और स्वरूप 

इकाई 1. 
* मध्यकालीन हिन्दी साहित्य : अभिप्राय, पृष्ठभूम एवं परिस्थितियाँ 
* काल सीमा, नामकरण का औचित्य 
* मध्यकालीन हिन्दी साहित्य विषयक चिंतन दृष्टिमाः 
आ. रामचन्द्र इकाई शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा व नगेन्द्र

इकाई 2. 
* मध्यकालीन दार्शनिक चेतनाएवं विविध दर्शन 
* मध्यकालीन सौदर्य चेतना और काव्य 
* मध्यकालीन लोक संस्कृति और काव्य
* मध्यकालीन भक्ति काव्य का स्वरूप एंव भक्ति आंदोलन (दार्शनि परिपेक्ष्य व अखिल भारतीय परिदृश्य) 

इलाई 3.  
* मध्यकालीन काव्यशास्त्रीय चिंतन की परंपरा और प्रदेय 
* मध्यकालीन हिन्दी काव्य में राष्ट्रीयता 
* मध्यकालीन नीति काव्य परंपरा और काव्य

इकाई 4. 
* मध्यकालीन हिंदी साहित्य का काव्य शिल्प
* मध्यकालीन काव्य भाषा बृजभाषा और अवधी 
* मध्यकालीन काव्य और काव्य रूपः प्रबन्ध, मुक्तक, प्रगीत


इकाई 1.

हिंदी साहित्य में महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान
1.1 सरस्वती पत्रिका का सम्पादन 
1.2. महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रमुख रचनाएँ 
1.3. इतिवृत्तात्मक शैली
1.4. मौलिक आलोचना के जनक 
1.5. युग प्रतिनिधि

हिंदी साहित्य में महावीर प्रसाद

द्विवेदी का योगदान

हिंदी साहित्य में महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण है। आपका जन्म दौलतपुर ( जिला रायबरेली) में सन १८७० ई. में और देवावसान १९२९ ई. में हुआ। भारतेंदु ने हिंदी गद्य के जिस रूप का परिवर्तन किया आचार्य द्विवेदी ने उस रूप को परिमार्जित करने में अपना योगदान दिया । इनका प्रभाव इस काल के अधिकांश कवियों पर पड़ा, जिसके कारण इस काम का नाम ही द्विवेदी युग में पड़ गया। द्विवेदी जी संस्कृत तथा मराठी साहित्य से विशेष प्रभावित थे। इनकी रचनाओं में इनका प्रभाव परिलक्षित होता है। हिंदी गद्य साहित्य की उन्नति के लिए इन्होने सरस्वती पत्रिका का संपादन किया।

सरस्वती पत्रिका का सम्पादन

सरस्वती के संपादन में द्विवेदी जी ने हिंदी में भाषा तथा व्याकरण से सम्बद्ध त्रुटियों दूर की गद्य लेखकों के लिए इन्होंने मार्गप्रदर्शक का ही काम नहीं किया अपितु उनका मार्ग भी प्रशस्त किया। भारतेंदु हरिश्चंद की तरह इन्होने भी अपना एक मंडल निर्मित किया जो द्विवेदी मंडल नाम से प्रसिद्ध हुआ। अपनी आलोचनाओं के माध्यम से द्विवेदी जी ने अधकचरे साहित्यकारों की बुराइयों दूर की तथा उन्हें

स्वस्थ साहित्य की रचना के लिए प्रेरित भी किया। भाषा को शिष्ट रूप प्रदान करने में द्विवेदी सदैव प्रयत्नशील रहे। भाषा के पारखी होने कारण कठिन से कठिन विषयों को भी सरल भाषा में व्यक्त करने की इनमें अद्भुत क्षमता थी। संस्कृत के तत्सम एवं तद्भव शब्दों का समवेश इनके निबंध में दृष्टिगोचर होता है। विदेशी शब्द अपनाकर हिंदी बनाने का कार्य भी इन्होंने किया। अंग्रेजी अरबी फारसी एवं उर्दू शब्दों का प्रयोग भी यत्न तंत्र उपलब्ध है।

महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रमुख रचनाएँ

द्विवेदी जी की रचनाएँ

संख्या में पचास के लगभग है। साहित्य 1. पुरातत्व, आलोचना विज्ञान नीति आदि विषयों पर इनके अनेक लेख प्रकाशित महावीर प्रसाद द्विवेदी है। विचार विमर्श नामक ग्रन्थ में इनके लेख संगृहीत हैं। नैषधचरितचर्या नाट्यशास्त्र, रसज्ञरंजन सुकविकीर्तन प्राचीन पंडित एवं कवि विचार विमर्श आदि इनकी श्रेष्ठ रचनाएँ हैं। काव्यों में देवस्तुतिशतक नागरीकाव्यमंजूषा कविता कलाप कान्यकुब्जलीलाव्रतम संपादकस्तव आदि प्रसिद्ध है। इनकी मौलिक रचनाओं के अतिरिक्त द्विवेदी ने दर्जनों अनूदित ग्रंथों की भी रचना की है। अनूदित ग्रंथों में भी इनकी मौलिकता स्पष्ट झलकती है। 

इतिवृत्तात्मक शैली

द्विवेदीजी ने काव्य के क्षेत्र में इतिवृत्तात्मक शैली को
अपनाया है। काव्य मंजूषा तथा सुमन में इनकी सहृदयता
कूट कूटकर भरी है। हृदय की विशिष्ट भावनाओं का
समावेश मार्मिकता एवं सरसता के साथ हुआ है। इनकी
कविता का एक उदाहरण देखिये-
मूल्यवान मंजुल शैया पर पहले निशा बिताता था।
सुयश और सुन्दर गीतों से प्रात जगाया जाता था।
वही आज तू कुश कासों से युक्त भूमि पर सोता है। 
अतिकर्कश श्रृगाल शब्दों से हा! हा! निंद्रा खोता है।

द्विवेदी जी कवि होने के साथ साथ उत्कृष्ट निबंधकार एवं समालोचक भी थे। इन्होने अधिकांश विचार प्रधान निबंधों की रचना की है। पाठकों को अपने विचारों से अवगत कराने के लिए ये एक बात को कई कई बार दुहराते हैं। व्याकरण की अशुद्धियों वाक्य विन्यास की त्रुटियों तथा विराम आदि की कमियों पर द्विवेदी का ध्यान सदैव केन्द्रित किया है। भाषा के परिष्करण तथा व्याकरण के शुद्धिकरण पर इन्होने विशेष ध्यान दिया है। इनके निबंधों में अधिकतर बातों का संग्रह है फिर भी उनमें चिंतन एवं विचार का प्राधान्य है। इनके निबंधों का श्रेणी विभाजन साहित्यिक निबंध उद्योग शिल्प, भूगोल, इतिहास आदि के रूप में किया जा सकता है।

मौलिक आलोचना के जनक

आलोचना के क्षेत्र में द्विवेदीजी सर्वप्रथम मौलिक आलोचक स्वीकार किये जा सकते हैं। इन्होंने आधुनिक आलोचना का मार्ग प्रशस्त किया। इन्होने सर्वप्रथम कालिदास की निरंकुशता नामक पुस्तक आलोचनात्मक अध्ययन के रूप में प्रस्तुत की है। इसके पश्चात विक्रमांकदेवचरितचर्चा तथा नेषधचरितचर्चा नामक आलोचनापुस्तकें लिखकर नवीन आलोचना शैली का सूत्रपात किया। द्विवेदीजी ने विचारात्मक आलोचनात्मक परिचर्यात्मक एवं भावात्मक शैली अपनाते हैं। विचारात्मक शैली में गंभीर विषयों की रचना की गयी है। आलोचनात्मक शैली में व्यंग्य का निरूपण किया गया है। भावात्मक शैली मार्मिक सरस प्रवाहपूर्ण एवं कोमलकांत पदावली युक्त है। परिचयात्मक शैली भावों के स्पष्टीकरण के लिए अपनाई गयी है। अतः छोटे छोटे वाक्यों का प्रयोग किया है।

युग प्रतिनिधि

आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने आधुनिक साहित्य में महावीरप्रसाद द्विवेदी के विषय में लिखा है जो कार्य द्विवेदी ने किया वह अनुवाद का हो काव्य रचना का हो आलोचना की हो अथवा भाषा संस्कार का हो या केवल साहित्य प्रतिनिधित्व का ही हो स्थायी महत्व का हो या अस्थायी . हिंदी के युगविशेष के प्रवर्तन एवं निर्माण में सहायक हुआ है। उसका ऐतिहासिक महत्व है उसी के आधार पर नवीन युग का साहित्य प्रासाद खड़ा किया जा सकता है। उनकी समस्त कृतियों युग का प्रतिनिधि होने का गौरव रखती है।


★★★★★
मध्यकालीन काव्य भाषा बृजभाषा और अवधीके काव्य
जब युग परिवर्तित होता है, तब जन जीवन की मान्यताओं , विचारों और उनसे जुड़ी हुई स्थितियों और प्रवृत्तियों में भी सहज रूप से परिवर्तन आ जाता है। भाषा भी युग परिवर्तन और जन जीवन के परिवर्तन से प्रभावित होती है। हिंदी भाषा भी मध्यकाल में इतनी परिवर्तित हो गयी है कि उसके स्वरुप की कुछ धाराएँ भी निश्चित हो गयी थी। ऐसी धाराओं में ब्रजभाषा और अवधी को विशेष महत्व प्राप्त हुआ। अवधी भाषा का प्रारंभिक रूप कबीर आदि संतों की सधुक्कड़ी भाषा में मिलता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि अवधी का जो रूप इन संतों की भाषा में मिलता है, वह अपरिष्कृत और असांस्कृतिक है। इसके बाद में जायसी ने अपने प्रेमाख्यानों में इसे साहित्यिक माध्यम बनाकर इसके रूप में कुछ परिमार्जन किया। अंत में तुलसीदास के इसे प्रौढ़ प्रेमाख्यान कवियों की भाषा ठेठ अवधी थी, किन्तु तुलसी ने उसमें संस्कृत शब्दावली का संयोग करके, परिमार्जित एवं प्रांजल बनाकर साहित्यिक भाषा का गौरव प्रदान किया।

अवधी भाषा का परिचय व साहित्यिक महत्व

अवधी भाषा अवधी भाषा की उत्पत्ति हुई है अवधी भाषा की रचनाएँ अवधी भाषा की प्रमुख विशेषताएं अवधी भाषा के प्रमुख कवि अवधी भाषा के शब्द अवधी का साहित्यिक भाषा के रूप में विकास साहित्यिक भाषा के रूप में भाषा avadhi bhasha sahityik bhasha ke Roop me awadhi bhasha अवधी भाषा का विकास अवधी भाषा का उद्भव और विकास पूर्ण अध्याय हिंदी साहित्य में अवधी भाषा का स्थान हिंदी साहित्य के इतिहास में अवधी भाषा अवधि

अवधी भाषा पूर्वी हिन्दी की सबसे मुख्य बोली है और

हिन्दी की उन बोलियों में है जिन्हें विश्वस्तरीय ख्याति प्राप्तः हुई है। इस बोली का नाम 'अवधी, अवध शब्द से स्थानान्तरण सम्बन्ध के आधार पर बना है। अवध' अयोध्या' काही नामान्तर है जो मध्ययुग में एक बहुत बड़े सूबे के रूप में विकसित था। प्राचीन भारतीय इतिहास में अयोध्या को दक्षिण कोशल की राजधानी माना गया है इस आधार पर इस बोली का एक अन्य नाम कोशली भी कहीं कहीं प्राप्त होता है सन्तों, कवियों ने कभी-कभी इसे पुरबिया भी कहा है पर आज इसका मुख्य और मान्य नाम 'अवधी' है।

अवधी भाषा क्षेत्र
अवधी का क्षेत्र आज उसी भू-भाग में है जिसमें 'अवध प्रान्त या राज्य था वर्तमान फैजाबाद और लखनऊ मण्डल के कुल 14 जिले अवधी क्षेत्र में आते है ये है बहराइच, गोण्डा, फैजाबाद, अम्बेडकरनगर, बाराबंकी, सुल्तानपुर प्रतापगढ़, रायबरेली, उन्नाथ लखनऊ, सीतापुर, लखीमपुर खीरी, हरदोई इस समय अवधी बोली बोलने वालों की क्षेत्रीय संख्या लगभग 5 करोड़ के आस-पास है।

अवधी साहित्य का इतिहास व महत्व

हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल का सम्पूर्ण सूफी प्रेमाख्यान काव्य और रामकाव्य धारा का अधिकतर साहित्य अवधी बोली में है। सूफी कवियों में मुल्ला दाउद, कुतुबन, मंझन जायसी, उसमान, नूरमोहम्मद कासिमशाह, शेखनिसार आदि इसी अवध क्षेत्र के निवासी थे और इसी में इन कवियों ने अपनी रचनाएँ भी की है। राम काव्यधारा में गोस्वामी तुलसीदास ने इस बोली की रामचरित मानस के माध्यम से विश्व कीर्ति प्रदान की। अन्य रामभक्त कवि जो तुलसी वाले मार्ग के है अथवा रसिक धारा के हैं, अवधी का माध्यम ही अपनाते रहे हैं।
भक्तिकाल की निर्गुणचारा में कई सन्तों जैसे जगजीवन साहब, मोहन साई आदि ने भी अवधी में ही काव्य रचना की। सम्पूर्ण सतनामी सम्प्रदाय इसी धारा में है। आधुनिककाल के कवियों की एक लम्बी परम्परा भी अवधी से जुड़ी है जैसे रमईकाका, वंशीधर शुक्ल, बलभद्रप्रसाद दीक्षित पढ़ीस, पं० द्वारकाप्रसाद मिश्र, गुरुप्रसाद 'मृगेश', विश्वनाथ पाठक, त्रिलोचन शास्त्री आदि रीतिकाल में भी अवधी में रचनाएँ चलती रहीं। इस तरह भक्तिकाल से लेकर आधुनिक काल तक अवधी बोली का साहित्यिक महत्त्व सर्वविदित है।



की प्रमुख रचनाएं अवधी भाषा के प्रमुख रचनाकार

अवधी भाषा के काव्य

अवधी में अधिकांशतः प्रबंधकाव्य ही अच्छे लिखे गए हैं। जायसी का पद्मावत कुतुबन की मृगावती, शेखनबी का ज्ञानदीप नूर मोहम्मद की इन्द्रावती आदि सूफी कवियों के रचित प्रेमाख्यान अवधी भाषा में लिखे गए हैं। अवधी का सबसे अधिक उल्लेखनीय प्रबंध काव्य तुलसी कृत रामचरितमानस है जो कि भक्ति प्रदान है। तुलसीदास ने अवधी को अपनाया, किन्तु वे ब्रजभाषा से भी अप्रभावित नहीं रह सके। उनकी विनयपत्रिका कृष्ण गीतावली जैसी रचनाओं में ब्रजभाषा ही प्रयुक्त हुई है। यदि हम हिंदी साहित्य के इतिहास पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि सोलहवीं शताब्दी के पश्चात अवधी भाषा में और कोई महत्वपूर्ण ग्रन्थ नहीं रचा गया। तुलसीदास के द्वारा अवधी चरमोत्कर्ष को प्राप्त हुई।

ब्रजभाषा काव्य

धीरे- धीरे कृष्ण भक्ति शाखा के कवियों ने ब्रजभाषा को महत्व देना प्रारंभ कर दिया। जैसे जैसे कृष्ण भक्ति का प्रचार -प्रसार बढ़ता गया वैसे वैसे ब्रजभाषा को भी महत्व मिलता गया। सूरदास नंददास कुंभनदास परमानन्ददास, चतुर्भुजदास छीतस्वामी और गोविन्दस्वामी व कृष्णदास आदि कवियों ने ब्रजभाषा को अधिकाधिक प्राणवती और सौन्दर्यमई बनाने का प्रयत्न किया। रसखान यद्यपि मुसलमान थे किन्तु कृष्णभक्त थे। उन्होंने भी ब्रजभाषा को ही अधिक महत्व दिया। ब्रजभाषा का प्रभाव आगे चलकर इतना व्यापक हो गया कि अपने उत्कर्षकाल में उसने समस्त उत्तरभारत में काव्य भाषा का स्थान प्राप्त कर लिया। ब्रजभाषा के साहित्यिक रूप में पर्याप्त निखार आ गया था और रीतिकाल में तो उसके स्वरुप में और परिष्कृति आ गयी। वह प्राणवान बन गयी सुन्दरता और शक्ति से संपन्न हो गयी। रीतिकवियों में बिहारी देव मतिराम और घनानंद व सेनापति आदि ने ब्रजभाषा को खूब सजा संवारकर प्रस्तुत किया। इस प्रकार कहा जा सकता है कि मध्यकाल में ब्रजभाषा और अवधी का ही प्रभाव अधिक रहा इस काल की भाषा के प्रारम्भिक रूपों में क्रिया , सर्वनाम आदि के प्रयोगों पर अपभ्रंश का ही अधिक प्रभाव रहा । विदेशी शब्दों का भी पर्याप्त समावेश हुआ है।

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